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असम के श्रीभूमि जिले की अचेप जनजाति एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा को आज भी जीवित रख रही है। यह दुर्गा पूजा लगभग 1,300 साल पुरानी मानी जाती है और इसे मूर्ति रहित मनाया जाता है।

इस पूजा में भव्य पंडाल या सजावट नहीं होती। पूजा स्थल को केले के पेड़ों से बनाया जाता है और अनुष्ठान बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न होते हैं।

यह पूजा केवल अचेप समुदाय तक सीमित नहीं है। विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग, जिनमें चराई समुदाय के लोग भी शामिल हैं, इस अनोखी परंपरा में भाग लेते हैं। केले के पत्तों पर भोग और प्रसाद अर्पित किया जाता है, ढोल और दुंदुमी की लयबद्ध ध्वनियाँ सुनाई देती हैं, और देवी दुर्गा की स्तुति में भजन गाए जाते हैं।

स्थानीय लोगों के लिए यह पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एकता, सांस्कृतिक सद्भाव और सामूहिक भक्ति का प्रतीक है। समुदाय के बुजुर्ग कहते हैं कि अचेप पूजा उनकी पहचान का अहम हिस्सा है और यह नई पीढ़ियों को विश्वास और एकजुटता के मूल्यों को बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है। यह परंपरा सादगी में भी अपने आप में बहुत शक्तिशाली और खास है।

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