भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने महाराष्ट्र के वर्तमान राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की ओर से उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया है। यह फैसला पार्टी की शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था संसदीय बोर्ड की बैठक में लिया गया, जिसकी जानकारी भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दी।
इस बैठक में सभी पहलुओं पर गंभीरता से चर्चा की गई और सभी सदस्यों के सुझावों के आधार पर सीपी राधाकृष्णन के नाम पर सर्वसम्मति से मुहर लगाई गई।
कौन हैं सीपी राधाकृष्णन?
सीपी राधाकृष्णन का संबंध तमिलनाडु से है और वे लंबे समय से भाजपा तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा से जुड़े रहे हैं। वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं और राज्य के शहरी व उच्च जातीय वर्गों में उनकी अच्छी खासी स्वीकार्यता है। उन्हें उपराष्ट्रपति जैसे उच्च संवैधानिक पद पर बिठाकर भाजपा एक साथ कई रणनीतिक संदेश देना चाहती है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और रणनीति
एनडीए के पास निर्वाचक मंडल में पूर्ण बहुमत है, जिससे राधाकृष्णन की जीत लगभग तय मानी जा रही है। परंतु यह फैसला केवल एक संवैधानिक पद की नियुक्ति नहीं है, बल्कि भाजपा की दक्षिण भारत को लेकर दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।
तमिलनाडु, जहां भाजपा अब तक निर्णायक सफलता नहीं हासिल कर पाई है, वहां द्रविड़ दलों – डीएमके और एआईएडीएमके – का दशकों से दबदबा रहा है। भाजपा को यहां की सांस्कृतिक और जातीय जटिलताओं का सामना करना पड़ता है, जो इसे केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण बनाता है।
मोदी-शाह की दृष्टि: तमिलनाडु में लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह यह भलीभांति जानते हैं कि तमिलनाडु जैसे राज्य में पैठ बनाने के लिए स्थानीय नेतृत्व और जातीय-सामाजिक संतुलन बेहद ज़रूरी है। सीपी राधाकृष्णन इस दृष्टि से पूरी तरह उपयुक्त उम्मीदवार हैं।
उन्हें उपराष्ट्रपति पद पर बैठाकर भाजपा न केवल तमिल समाज को सम्मान और सहभागिता का संदेश देना चाहती है, बल्कि आरएसएस के प्रति अपनी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता भी दोहराती है। यह कदम दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु, को भाजपा के राजनीतिक नक्शे पर एक लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट ज़ोन के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा सकता है।
निष्कर्ष
सीपी राधाकृष्णन की उम्मीदवारी यह संकेत देती है कि भाजपा अब तमिलनाडु को केवल एक कठिन चुनौती नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में देख रही है। दिल्ली की सत्ता में तमिल समाज को हिस्सेदारी देकर वह दक्षिण भारत की राजनीति में स्थायी और सशक्त उपस्थिति बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।