आजकल सबकुछ इंस्टा-फ्रेंडली चाहिए। स्किनकेयर की पूरी दुकान बाथरूम में होनी चाहिए — एक फेस सीरम, एक नाइट क्रीम, एक अंडर आई जेल और ना जाने क्या-क्या! लेकिन सच कहूं? सबसे भरोसेमंद चीज़ तो एक हरे रंग की छोटी सी बोरोलिन की डिब्बी है।
अगर घर के किसी कोने में वो हरी रंग की छोटी सी डिब्बी पड़ी हो, तो ज़रा गौर से देखो — वो बोरोलिन है। और असली गेम चेंजर वही है।
बोरोलिन किसी फैंसी पैकेजिंग में नहीं आती। उस पर “dermatologist recommended” या “infused with vitamin C and gold” जैसे शब्द नहीं लिखे होते। लेकिन इसका असर, उस किसी भी 1000 रुपए वाली क्रीम से कहीं ज़्यादा भरोसेमंद होता है।
सबसे कम बोला गया स्किनकेयर सुपरस्टार
बोरोलिन बस एक मॉइश्चराइज़र नहीं है। ये घावों की दवा है, रूखे होंठों का इलाज है, फटी एड़ियों की राहत है और थकी हुई स्किन की ट्रीटमेंट भी।
नानी-दादी इसे एक डिब्बी में समेट कर सब कुछ कह जाती थीं।
जनरेशन Z का मिसिंग कनेक्शन
आज की जनरेशन को लगता है कि जो चीज़ महंगी है, वही असरदार है। ₹1000 की ग्लो क्रीम और ₹1500 का नाइट जेल लगाना ट्रेंड है।
लेकिन जो क्रीम दशकों से हर घर में बिना शोर-शराबे के कमाल कर रही है, वो शायद ‘aesthetic enough’ नहीं लगती।
बोरोलिन की सबसे खूबसूरत बात यही है — ये दिखावा नहीं करती, बस अपना काम करती है। कोई ब्रांडिंग, कोई फैंसी influencer ads की ज़रूरत नहीं। नानी का दिया भरोसा ही इसका सबसे बड़ा प्रमोशन है।
हर घर में होती थी, हर स्किन को समझती थी
बचपन में स्किन फटती थी, मां चुपचाप बोरोलिन लगा देती थी। चोट लगती थी, बेरोलिन। होंठ सूखते थे, बोरोलिन।
अब जब हमारे पास दर्जनों प्रोडक्ट्स हैं, तब भी वो असर नहीं मिलता जो एक बोरोलिन की पतली सी परत से मिल जाता है।
असल में, यह एक भावना है
बोरोलिन सिर्फ एक क्रीम नहीं, एक फीलिंग है। पुराने ज़माने की सादगी और आज की स्किन की ज़रूरत — दोनों का बैलेंस है इसमें।
ये न ब्रांड की रेस में है, न इंस्टा ट्रेंड्स के पीछे भागती है। फिर भी हर बार जीतती है — सस्तेपन में, असर में और भरोसे में।
आज की सबसे बड़ी स्किन केयर सलाह?
कोई ग्लास स्किन वाली सीरम मत ढूंढो,
बस मम्मी की आलमारी से बोरोलाइन निकाल लो।
क्योंकि जो पुरानी चीज़ें होती हैं,
वो कभी outdated नहीं होतीं —
बस underestimated होती हैं।