क्या आप सोच सकते हैं कि एक मिशन, जो सिर्फ एक हफ्ते का होना था, नौ महीने तक खिंच गया? नासा के अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और बूच विलमोर, जिन्होंने खुद को विज्ञान के नाम समर्पित किया, अब सवालों के घेरे में हैं। उनके इस अतिरिक्त समय के लिए उन्हें कितना मेहनताना मिला? बस 5 डॉलर यानी 430 रुपये प्रति दिन!
नासा के नियमों के अनुसार, सरकारी कर्मचारियों के रूप में सुनीता और विलमोर को उनके तय वेतन के अलावा कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं मिलेगा। उनकी सालाना सैलरी भले ही 1.30 करोड़ रुपये के करीब हो, लेकिन उन्हें स्पेस में बिताए गए 278 अतिरिक्त दिनों के लिए कोई ओवरटाइम वेतन नहीं दिया जाएगा। स्पेस में नौ महीने बिताने के बाद जब वे पृथ्वी पर लौटे, तो उनका शरीर कमजोर हो चुका था, सामान्य ज़िंदगी में लौटने के लिए उन्हें अब महीनों की रिकवरी करनी होगी। अंतरिक्ष में माइक्रोग्रेविटी में रहने के कारण शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है, मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं, और यहां तक कि सीधा खड़ा होना भी मुश्किल हो जाता है। लेकिन इसके बदले में उन्हें बस 430 रुपये प्रति दिन दिए जा रहे हैं।
जब यह आंकड़ा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने रखा गया, तो वह भी हैरान रह गए। उन्होंने कहा—”क्या बस इतना ही? जो उन्होंने झेला, उसके लिए यह बहुत कम है!” ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि अगर जरूरत पड़ी, तो वह अपनी जेब से उनके ओवरटाइम का भुगतान करेंगे।
अब सवाल ये उठता है—क्या NASA जैसी बड़ी एजेंसी अपने अंतरिक्ष यात्रियों को इतना कम भुगतान करके उनके बलिदान को नजरअंदाज कर रही है? क्या यह सही है कि इतने महत्वपूर्ण मिशन पर जाने वाले वैज्ञानिकों को ओवरटाइम वेतन भी न मिले? क्या इन नायकों के संघर्षों की कोई कीमत नहीं? क्या वैज्ञानिकों की मेहनत का सही मूल्य दिया जा रहा है?