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मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू… जिन्होंने भारत के खिलाफ ‘इंडिया आउट’ जैसा कैंपेन चलाया था, वही अब भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं। कभी चीन के सबसे बड़े समर्थक माने जाने वाले मुइज्जू अब खुद को भारत के नज़दीक लाने में लगे हैं। वजह साफ है—भारत से दूरी बनाना मालदीव को बहुत भारी पड़ गया है।

जब मुइज्जू ने राष्ट्रपति पद संभाला, तो परंपरा के उलट सबसे पहले भारत आने की बजाय उन्होंने दिसंबर 2023 में तुर्किए और जनवरी 2024 में चीन का दौरा किया। भारत के बदले चीन का दामन थामने की ये गलती अब उन्हें बहुत महंगी लग रही है। पर्यटन से लेकर अर्थव्यवस्था तक, हर मोर्चे पर मालदीव को नुकसान हुआ है।

भारत से दूरी, नुकसान भारी

मालदीव की अर्थव्यवस्था का लगभग 28% हिस्सा पर्यटन से आता है—और उसमें सबसे ज्यादा पर्यटक भारत से ही जाते हैं। लेकिन जब 2024 में ‘बॉयकॉट मालदीव’ का ट्रेंड चला, तो मालदीव की टूरिज्म इंडस्ट्री हिल गई। नतीजा? होटलों में बुकिंग्स घटीं, रिवेन्यू गिरा और दुनिया को एक बड़ा संदेश गया—भारत की नाराज़गी भारी पड़ सकती है।

चीन की गोदी से निकलकर फिर भारत की छांव में

भारत ने फिर भी अपना नेबरहुड फर्स्ट नीति निभाई। मालदीव को 800 मिलियन डॉलर का कर्ज दिया जिससे एयरपोर्ट, पुल और सड़क जैसी बड़ी परियोजनाएं पूरी हुईं। इतना ही नहीं, 750 मिलियन डॉलर की करेंसी स्वैप सुविधा भी दी गई जिससे मालदीव की नकदी संकट दूर हुई।लेकिन चीन? उसने मालदीव को अपने कर्ज के जाल में फंसा दिया। अब मालदीव को समझ आ गया है कि चीन से ज्यादा भरोसेमंद साथी भारत है।
अगस्त 2024 में भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने मालदीव का दौरा किया। इस एक कूटनीतिक यात्रा ने रिश्तों में जमी बर्फ को पिघला दिया। भारत ने साफ कर दिया कि अगर मालदीव भरोसे के साथ चले, तो भारत हर मोर्चे पर साथ देगा।
अब 25 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालदीव पहुंचे हैं। यह दौरा न सिर्फ राजनीतिक बल्कि रणनीतिक भी है। मुइज्जू को अब अच्छी तरह समझ में आ गया है—भारत को नाराज़ करना मतलब खुद की नींव हिलाना।

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