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असम की धरती से जुड़ी एक ऐसी खबर, जिसने फिर से लोगों के जख्म हरे कर दिए हैं। क्या सच में न्याय 2047 में मिलेगा? क्या जुबीन गर्ग की मौत के मामले में फैसला आने में 20 साल लग सकते हैं? शुक्रवार को अदालत में हुई सुनवाई में एक हैरान कर देने वाली बात सामने आई। केस से जुड़े एक वकील ने कहा कि अगर इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में नहीं भेजा गया, तो फैसला आने में कम से कम बीस साल लग सकते हैं। वजह बताई गई कि गवाह बहुत ज्यादा हैं और सबूत भी काफी जटिल हैं। लेकिन इस एक बयान ने पूरे असम में चिंता और गुस्सा दोनों बढ़ा दिए हैं।


13 फरवरी की रेगुलर सुनवाई में यह बात कानूनी प्रक्रिया के दौरान कही गई, लेकिन इसका असर सिर्फ कोर्ट तक सीमित नहीं रहा। लोगों के दिल पर इसका सीधा असर पड़ा है। अगर वकील की बात सही साबित होती है, तो जुबीन गर्ग की मौत का मामला 2046 या उससे भी आगे तक चल सकता है। यानी क्या सच में न्याय के लिए एक पूरी पीढ़ी को इंतजार करना पड़ेगा? जुबीन गर्ग सिर्फ एक गायक नहीं थे। वे असम की पहचान थे, एक आवाज जो हर घर में गूंजती थी। उनके गीतों ने भाषा, जाति और सीमाओं से ऊपर उठकर लोगों को जोड़ा। ऐसे में अगर उनके मामले में न्याय में देरी होती है, तो यह सिर्फ एक परिवार का नहीं, पूरे असम का दर्द बन जाएगा।
धीमी कानूनी प्रक्रिया से नाराज होकर गरिमा गर्ग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। उन्होंने मांग की है कि मामले में तुरंत हस्तक्षेप किया जाए और इसे तेज करने के लिए कदम उठाए जाएं।
राज्य सरकार ने भी कहा है कि वह समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए मजबूत कदम उठाने के पक्ष में है। लेकिन अब तक फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। यही सबसे बड़ा सवाल है। अगर सरकार साथ है, तो फैसला कब? भारत की न्याय व्यवस्था पहले से ही मामलों के बोझ से दबी हुई है। बड़े मामलों में, जहां गवाह ज्यादा हों और दस्तावेज भारी हों, वहां प्रक्रिया और लंबी हो जाती है। लेकिन असम के लोगों के लिए यह सिर्फ कानूनी मुद्दा नहीं है। यह सम्मान, भावना और भरोसे का सवाल है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले के लिए फास्ट ट्रैक मैकेनिज्म बनाया जाएगा? क्या अदालत और सरकार मिलकर इस केस को प्राथमिकता देंगी?
या फिर सच में, जुबीन गर्ग के लिए न्याय 2047 तक इंतजार करेगा?
असम जवाब चाहता है। और इस बार, जवाब जल्दी चाहिए।

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