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असम में चुनाव का माहौल बनना शुरू हो गया है और इसी बीच सरकार की सबसे चर्चित योजना ओरुनोदोई फिर सुर्खियों में आ गई है। राज्य सरकार करीब 40 लाख महिलाओं को नौ हजार रुपये दे रही है, जिसे रोंगाली बिहू का तोहफा बताया जा रहा है। लेकिन इस फैसले के साथ कई बड़े सवाल भी उठने लगे हैं। क्या यह सच में महिलाओं की मदद है या फिर चुनाव से पहले वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति? और जब राज्य का कर्ज लगातार बढ़ रहा है, तो इतने बड़े भुगतान का पैसा आएगा कहां से?


दरअसल, सरकार ने फैसला किया है कि ओरुनोदोई योजना के तहत लाखों महिला लाभार्थियों को एकमुश्त नौ हजार रुपये दिए जाएंगे। इसे बिहू के तोहफे के रूप में पेश किया जा रहा है, लेकिन राजनीतिक और आर्थिक हलकों में इस पर बहस तेज हो गई है। कई लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह फैसला सच में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए है या फिर चुनाव से पहले महिला मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश।
जानकारी के मुताबिक इस एक फैसले के लिए सरकार को करीब 3600 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इतना पैसा आएगा कहां से। रिपोर्ट बताती हैं कि पिछले कुछ महीनों में असम सरकार ने हजारों करोड़ रुपये का कर्ज लिया है और राज्य का कुल कर्ज अब दो लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा बताया जा रहा है। ऐसे में लोग पूछ रहे हैं कि क्या कर्ज लेकर इस तरह नकद पैसा बांटना सही आर्थिक नीति है? क्या इससे आने वाले समय में राज्य की आर्थिक हालत और ज्यादा मुश्किल नहीं हो जाएगी?
इसी मुद्दे पर पहले भी सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया चिंता जता चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार राज्यों से पूछा है कि चुनाव से पहले इस तरह मुफ्त पैसे या योजनाएं क्यों दी जाती हैं और इसका खर्च आखिर कौन उठाएगा। अदालत ने यह भी कहा था कि ऐसे फैसलों से आगे चलकर राज्यों की आर्थिक हालत पर बुरा असर पड़ सकता है। लेकिन इन चेतावनियों के बावजूद सरकारें चुनाव के समय ऐसी योजनाएं लाने से पीछे नहीं हटती हैं।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा बार-बार कहते हैं कि उनकी सरकार महिलाओं को मजबूत बना रही है और गरीब परिवारों को सहारा दे रही है। लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सिर्फ नकद पैसा देना ही असली सशक्तिकरण है। कई लोग मानते हैं कि अगर सच में महिलाओं को मजबूत बनाना है तो शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देना होगा। क्योंकि असम की राजनीति में अब महिला मतदाता एक बड़ी ताकत बन चुकी हैं और माना जाता है कि कई सीटों पर वही चुनाव का नतीजा तय करती हैं। ऐसे में यह सवाल और भी बड़ा हो जाता है कि क्या यह योजना महिलाओं की मदद से ज्यादा वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बनती जा रही है।
इस बीच जनता की चिंता एक और वजह से भी बढ़ रही है। एक तरफ सरकार नकद सहायता दे रही है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू गैस सिलेंडर के दाम में साठ रुपये की बढ़ोतरी, जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतें और बिजली के स्मार्ट मीटर को लेकर आने वाले ऊंचे बिलों का डर लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। कई लोग कह रहे हैं कि जो पैसा सरकार दे रही है, वह महंगाई में जल्दी खत्म हो जाता है।
यही वजह है कि अब असम में एक बड़ा सवाल उठ रहा है। क्या यह योजना वास्तव में लोगों की जिंदगी सुधारने के लिए है, या फिर चुनाव से पहले माहौल बनाने की कोशिश? क्या सरकार को कर्ज लेकर ऐसे बड़े भुगतान करने चाहिए? और क्या इससे असम की आने वाली पीढ़ियों पर आर्थिक बोझ नहीं बढ़ेगा? इन सवालों के जवाब अब सरकार और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को देने होंगे।

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